वर्मीकम्पोस्ट - जैविक खाद
हरित क्रांति के पश्चात भारतीय कृषि ने अभूतपूर्ण प्रगति की है लेकिन इस उद्देष्य को पाने के लिए किसानों द्वारा रासायनिक उर्वरकों कीटनाषियों खरपतवार नाषियों तथा विभिन्न प्रकार के रसायनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग किया जा रहा है। जिससे भूमि की उर्वरकता क्षमता में निरन्तर gkl हो रहा है। फसलों बीमारियों तथा कीटोें के प्रति रोधक क्षमता भी कम हो रही है। इनके नियंत्रण के लिए किसानों का कृषि रसायनों पर व्यय बढ़ रहा है।
कृषि उत्पादन को टिकाऊ तथा लाभकारी बनाने केे लिए हमें जैविक कृषि पर अधिक ध्यान देना होगा।
वर्मीकम्पोस्ट जैविक कृषि का एक महत्वपूर्ण घटक है।
केंचुआ द्वारा कार्बनिक पदार्थाें को कम्पोस्ट में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को वर्मी कम्पोस्टिंग कहते है।
वर्मीकम्पोस्ट में साधारण कम्पोस्ट की तुलना में पौधों के लिए पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में तथा आसानी से उपलब्ध होते है।
इसके अलावा वर्मीकम्पोस्ट में वृद्धि हार्मोन एन्जाइम विटामिन तथा उपयोगी सूक्ष्मजीव पाये जाते है। इसके खेतों में प्रयोग से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है। साथ ही फसलोें की गुणवत्ता व उत्पादन में बढोत्तरी होती है।
वर्मीकम्पोस्टिंग के लिए उपयुक्त केंचुओं की प्रजातियाॅ
प्राकृतिक रूप से मिट्टी में केंचुओं की कई प्रजातियाॅ पाई जाती है। लेकिन इनका प्रयोग सामान्यतः वर्मीकम्पास्टिंग के लिए नही होता है।
वर्मीकम्पोस्टिंग के लिए मुख्यतः तीन प्रजातियाॅ उपयोग होती है:-
आइसीनिया फेटिडा
यूड्रिलस यूजीनिया
पेरियानीक्स एक्सकेवेटस
वर्मीकम्पोस्टिंग में प्रयोग होने वाले प्रदार्थ:-
जैव विघटनषील कार्बनिक पदार्थ जैसे फसलो के अवषेष, गोबर, कूड़ा-कचरा व्यर्थ षाक सब्जियाॅ, घास- फूस, फल - फूल संसाधित कियें खाद्यान्नों कें अवषिष्ट गन्ने की खोई, इत्यादि।
वर्मीकम्पोस्टिंग बनाने की विधि -
1. वर्मीकम्पोस्ट को किसी भी प्रकार के पात्र जैसे मिट्टी या चीनी कि बर्तन, वाषवेसिन या लकड़ी के बक्से इत्यादि में बनाया जा सकता है।
2. इस प्रक्रिया को भूमि में गड्ढे (पिट) बनाकर या क्यारी (वर्मीकम्पोस्ट बेड) बना कर भी किया जा सकता है बेड की चैडाई लगभग 1.0 मी0 तक रख सकते है बैड की ऊँचाई 1.5-2.5 मी0 रख सकते है। लम्बाई स्थानानुसार रख सकते है।
3. पिट या क्यारी की प्रथम सतह पर 4-5 सेमी0 बारीक बालू को बिछाकर बनाऐ
4. इसके ऊपर समान मोटाई की दूसरी सतह किसी भी विघटन षील पदार्थ जैसे पत्तो, भूसा या धान के पुआल से बनाएं।
5. इसके ऊपर 25 - 30 सेमी0 मोटी परत 10 - 15 दिन पुराने गोबर की बिछाऐं।
6. जिस खरपतवार या वनस्पति पदार्थ से आप कम्पोस्ट बनाना चाहते है। उसे छोटे - छोटे टुकडों ( 2 से 3 सेमी0) में काटकर गोबर में मिलाकर ( 1.3 के अनुपात में ) बिछा दे। इस सतह की उॅचाई 10 - 15 सेमी0 रखे इस प्रक्रिया में आंषिक रूप से गलान तथा कम्पोस्टिग क्रिया होगी।
7. इसके पष्चात उपरोक्त पिट या बेड पर 1000 केंचुए प्रति वर्ग मी0 की दर से ऊपरी सतह पर छोड़ दे तथा बोरी या टाट, केले के पत्तो से ढ़क दें।
8. इन बोरियों पर पानी छिड़कते रहे ताकि नमी का स्तर 40 - 60 प्रतिषत बना रहे।
9. केंचुए के लिए तापमान 36 से 40 बहुत अच्छा रहता है।
10. वर्मीकम्पोस्ट 2 - 3 महीने में तैयार हो जाती है।
वर्मी वर्मीकम्पोस्ट को एकत्र तथा संग्रह करना :
जब वर्मीकम्पोस्ट तैयार हो जाती है। तो इसकी ऊपरी सतह भुरभुरी, दानेदार, देखने में उबली चाय
की पत्ती जैसी प्रतीत होती है
इसको एकत्रित करने के लिए पहले तीन - चार दिन तक पानी देना बन्द कर देते
अन्य विधि :
*3-4 दिन पानी देना बन्द कर देते है। पिट को दो भागों में विभाजित कर लेते है पहले भाग
की वर्मीकम्पोस्ट को 10 = 15 सेंमी० रखकर दूसरे भाग पर रख देते है।
खाली स्थान पर 10 - 15
दिन पुराने गोबर को डाल देते है। केंचुए वर्मीकम्पोस्ट
से गोबर में चले जाएगें। तैयार खाद को
एकत्र कर ले। कम्पोस्ट को छायादार स्थान में सुखा कर 2.5 सेमी0 की छलनी से छान कर
पौलीथीन या एच0 डी0 पी0 के बोरों में भर दें।
वर्मीकम्पोस्ट का उपयोग:-
फसलो में डाले जाने वाले वर्मीकम्पोस्ट की मात्रा उनकी पोषक तत्वों की आवष्यकतानुसार निर्धारित की जा सकती है।
सामान्यतः खाद्यान्न फसलों में वर्मीकम्पोस्ट 5 टन प्रति हैक्टेयर प्रथम वर्ष, 2.5 टन प्रति हैक्टेयर द्वितीय वर्ष तथा 1.5 टन प्रति हैक्टेयर तृतीय वर्ष में प्रयोग करें।
सब्जी वाली फसलों के लिए 10 से 12 टन प्रति हैक्टेयर की दर से डालें
गमलों के माप के अनुसार 100 से 200 ग्राम उपयोग करें।
फलदार वृक्ष में 1 से 10 किलोग्राम प्रतिवर्ष की आयु व आकार के अनुसार तने के चारों ओर घेरा बना कर डाले।
फसलो में डाले जाने वाले वर्मीकम्पोस्ट की मात्रा उनकी पोषक तत्वों की आवष्यकतानुसार निर्धारित की जा सकती है।
सामान्यतः खाद्यान्न फसलों में वर्मीकम्पोस्ट 5 टन प्रति हैक्टेयर प्रथम वर्ष, 2.5 टन प्रति हैक्टेयर द्वितीय वर्ष तथा 1.5 टन प्रति हैक्टेयर तृतीय वर्ष में प्रयोग करें।
सब्जी वाली फसलों के लिए 10 से 12 टन प्रति हैक्टेयर की दर से डालें
गमलों के माप के अनुसार 100 से 200 ग्राम उपयोग करें।
फलदार वृक्ष में 1 से 10 किलोग्राम प्रतिवर्ष की आयु व आकार के अनुसार तने के चारों ओर घेरा बना कर डाले।
1. वर्मीकम्पोस्ट में सूक्ष्मजीव, एन्जाइम, विटामिन और वृद्धि- वर्घक हारमोन्स पर्याप्त मात्रा मंे होते है।
2. वर्मीकम्पोस्ट सामान्य कम्पोस्ंिटग प्रक्रिया से कम समय में तैयार होती है।
3. वर्गीकम्पोस्ट में सामान्य कम्पोस्ट की तुलना में नाइट्रोजन फास्फोरस, पोटाष तथा लाभकारी सूक्ष्म तत्व अधिक मात्रा में होते है।
4. वर्मीकम्पोस्ट के उपयोग से भूमि की जलधारण क्षमता में सुधार होने के साथ - साथ उर्वरा ष्षक्ति भी बढ़ती है।
5. वर्मीकम्पोस्ट फसलों में उपयोग करने से खरपतवार कीटों व बीमारियों का प्रकोप कम होता है।
6. वर्मीकम्पोस्ट का पौधों तथा मिट्टी के मित्र जीवों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ता है।
7. वर्मीकम्पोस्ट द्वारा सब प्रकार के जैव विघटनषील, कार्बनिक व्यर्थ पदार्थाें के अपघटन से खाद बनाना सम्भव है। ये पदार्थ इधर-उधर डाल दिये जाते है। जिससे प्रदूषण व स्वास्थय से सम्बन्धित समस्याऐं जन्म लेती है।
8. वर्मीकम्पोस्टिंग हमं रोजगार सृजन का अवसर प्रदान करता है।
9. आइसीनिया फेटिडा केंचुओं में एक वकल केविटी पायी जाती है। जो खरपतवारों के बीज को पचा जाती है। जिससे वे खरपतवार सदा के लिऐ नष्ट हो जाता है।
,3. केंचुओं को डाले गये पदार्थ में जहरीले तत्वों के अवषेष नही होने चाहिए।
4. व्यर्थ पदार्थ जिससे आप कम्पोस्ट बनाना चाहते है। उन्हें छोटे - छोटे ( 2 से 3 सेमी0) टुकडों में काट कर गोबर में मिला कर (1: 3 के अनुपात में ) 2 - 3 सप्ताह तक आंषिक रूप में सड़ाने के बाद ही डाले इस प्रक्रिया से वर्मीकम्पोस्टिंग तीव्र हो जाती है।
5. वर्मीकम्पास्टिंग क्यारियों को मोर, नेबला, चीटियों इत्यादि परभक्षियों से बचाऐं
वर्मीवाष का उपयोग:-
वर्मीकम्पोस्टिंग पिटों से निकला हुआ फालतू पानी जिसे हम वर्मीवाष कहते हैं।
1. इस वर्मीवाष को सिचाई जल के साथ मिलाने से पौधों को पानी के साथ-साथ पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। जिससे हमें अधिक लाभ मिलता है।
2. इस पानी में (वर्मीवाष) नीम के पत्ते गलाने के बाद ये कीटनाषक और टाॅनिक दोनों का काम करता है।
3. यह हमारी, फसल के लिए अति उत्तम होता है।
2. वर्मीकम्पोस्ट सामान्य कम्पोस्ंिटग प्रक्रिया से कम समय में तैयार होती है।
3. वर्गीकम्पोस्ट में सामान्य कम्पोस्ट की तुलना में नाइट्रोजन फास्फोरस, पोटाष तथा लाभकारी सूक्ष्म तत्व अधिक मात्रा में होते है।
4. वर्मीकम्पोस्ट के उपयोग से भूमि की जलधारण क्षमता में सुधार होने के साथ - साथ उर्वरा ष्षक्ति भी बढ़ती है।
5. वर्मीकम्पोस्ट फसलों में उपयोग करने से खरपतवार कीटों व बीमारियों का प्रकोप कम होता है।
6. वर्मीकम्पोस्ट का पौधों तथा मिट्टी के मित्र जीवों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ता है।
7. वर्मीकम्पोस्ट द्वारा सब प्रकार के जैव विघटनषील, कार्बनिक व्यर्थ पदार्थाें के अपघटन से खाद बनाना सम्भव है। ये पदार्थ इधर-उधर डाल दिये जाते है। जिससे प्रदूषण व स्वास्थय से सम्बन्धित समस्याऐं जन्म लेती है।
8. वर्मीकम्पोस्टिंग हमं रोजगार सृजन का अवसर प्रदान करता है।
9. आइसीनिया फेटिडा केंचुओं में एक वकल केविटी पायी जाती है। जो खरपतवारों के बीज को पचा जाती है। जिससे वे खरपतवार सदा के लिऐ नष्ट हो जाता है।
सावधानियाॅ:-
1. वर्मीकम्पोस्टिंग क्यारी को धूप से और वर्षा से बचाऐं।
2. वर्मीकम्पोस्टिंग क्यारी या बेड में लवणीय पानी का प्रयोग न करें।,3. केंचुओं को डाले गये पदार्थ में जहरीले तत्वों के अवषेष नही होने चाहिए।
4. व्यर्थ पदार्थ जिससे आप कम्पोस्ट बनाना चाहते है। उन्हें छोटे - छोटे ( 2 से 3 सेमी0) टुकडों में काट कर गोबर में मिला कर (1: 3 के अनुपात में ) 2 - 3 सप्ताह तक आंषिक रूप में सड़ाने के बाद ही डाले इस प्रक्रिया से वर्मीकम्पोस्टिंग तीव्र हो जाती है।
5. वर्मीकम्पास्टिंग क्यारियों को मोर, नेबला, चीटियों इत्यादि परभक्षियों से बचाऐं
वर्मीवाष का उपयोग:-
वर्मीकम्पोस्टिंग पिटों से निकला हुआ फालतू पानी जिसे हम वर्मीवाष कहते हैं।
1. इस वर्मीवाष को सिचाई जल के साथ मिलाने से पौधों को पानी के साथ-साथ पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। जिससे हमें अधिक लाभ मिलता है।
2. इस पानी में (वर्मीवाष) नीम के पत्ते गलाने के बाद ये कीटनाषक और टाॅनिक दोनों का काम करता है।
3. यह हमारी, फसल के लिए अति उत्तम होता है।
अन्य जानकारियाॅ:-
1 आइसीनिया फेटिडा नामक केंचएं का जीवन चक्र 90 दिन का होता है।
2 ये जन्म के 23 दिन बाद प्रजनन क्रिया षुरू कर देते है।
3 एक कोकोन या अण्ड़ा से दो या तीन केचुऐं निकलते है।
4 इनके जीवन के लिए तापमान 36 से 40 के बीच होना चाहिए।
5 ये केचुएं अन्धरे में 24 घण्टे कार्य करते है। अतः पिट/गड्ढों को ढककर रखना चाहिए। ताकि केचुएं कम्पोस्ट का उत्पादन अधिक करें।
और हम mushroom ki खेती कर के भी अच्छा पैसा कमा सकते है जानने के लिए निचे क्लिक करे
1 आइसीनिया फेटिडा नामक केंचएं का जीवन चक्र 90 दिन का होता है।
2 ये जन्म के 23 दिन बाद प्रजनन क्रिया षुरू कर देते है।
3 एक कोकोन या अण्ड़ा से दो या तीन केचुऐं निकलते है।
4 इनके जीवन के लिए तापमान 36 से 40 के बीच होना चाहिए।
5 ये केचुएं अन्धरे में 24 घण्टे कार्य करते है। अतः पिट/गड्ढों को ढककर रखना चाहिए। ताकि केचुएं कम्पोस्ट का उत्पादन अधिक करें।
क्या हम वर्मी कम्पोस्ट से इनकम भी कर सकते है
जी हां बिलकुल हम वर्मी कम्पोस्ट को ज्यादा मात्रा में बनाकर उसको मार्किट में अच्छी कीमत में बिक्री कर सकते हैऔर हम mushroom ki खेती कर के भी अच्छा पैसा कमा सकते है जानने के लिए निचे क्लिक करे



